वो ओझल गई थी। आखों के बीच से फिसल गई थी।
मेरा हाथ अब भी उसके दाहिने हाथ की कोहनी को छूने का प्रयास कर रहा था, पर वो ओझल हो गई थी, जैसे एक सिंहपर्णी का फूल फूक मारने पर तुरंत गायब हो जाता है।
ऐसा पहली बार हुआ था, जब वो मुझे छोड़कर चली गई थी, सात साल के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ।
मैं अचानक उठा मेरे जांघों के नीचे पत्थर मुझे चुभे और मैं अब खड़ा हो गया। सब नया सा दिख रहा था, अजनबी सा। पेंट पर लगी धूल झाड़ कर मैं वहां से भाग गया, घर की तरफ।
घर के सभी सदस्य तो मेरी बीमारी के बारे में जानते ही थे, अब बाहर के भी लोग घर आकर अपने अपने हिस्से की सांत्वना मुझे भेंट करते और मैं "उनकी सांत्वना से अच्छा हो रहा हूं" का ढोंग करके उनकी सांत्वना अपने बिस्तर के नीचे डाल देता। लोग कानाफूसी करते थे की अब ये बचेगा नहीं, घर वाले इसको इतनी सहजता से नही बोल पाते थे, हां पर वो भी घुमा फिरा के, तोड़ मरोड़ के यही बोलते थे, की मेरा अंत करीब ही है।
जितनी सहजता से लोग इसे बोल देते थे, उतनी सहजता से मैं इस मान नहीं पता था, अभी मैंने देखा ही क्या था? चंद दोस्त, परीक्षाएं, स्कूल। भला ये कोई उमर है मरने की।
जबसे पता पड़ा की मेरे पास समय कम है, मेरा समय अच्छा क्यों नही जा रहा।
एक दिन तो मैने शिकायत कर दी,
मंदिर में मां मेरे लिए पूजा कर रही थी, मां का मानना था की जिस दिन ठाकुरजी की बांसुरी और उंगलियों के बीच का फसा हुआ गेंदे का फूल उनकी प्रार्थना से गिर जाएगा, उस दिन मैं ठीक हो जाऊंगा, उस दिन ठाकुरजी मेरी और मां की सुन लेंगे और मैं उस दिन से चंगा भला हो जाऊंगा।
मां घंटो तक मूर्ति को सजीव करने के लिए निर्जीव बैठी रहती, इस ही आस में की आज फूल गिरेगा और मैं ठीक हो जाऊंगा, पर यूं हो नही रहा था।
जब मां को बोध होता की तीन घंटे बीत चुके हैं, मां रोते हुए उठती और पीछे मुझे खड़ा पाती, मैं भी चाहता था, की फूल गिरे, मेरे लिए नहीं तो मेरी मां के लिए।
एक दिन तो मां जब भोग लगाने के लिए उठी, मैने उस गेंदे के फूल को थोड़ा ढीला कर दिया, ताकि वो कुछ देर में गिर जाए और मां को लगे की फूल भगवान की इच्छा से गिरा है। उस दिन मां के पास बैठ मैने भी तीन घंटे उस फूल को ताका, पर फूल गिरा नही।
मुझे सब धुंधला सा लगने लगा था, ऐसा लग रहा था की विधाता मेरे जीवन से विश्वास नाम की घास उखाड़ रहा हो। बहुत तर्क वितर्क करने के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा था की मैने ऐसा कुछ नही किया है जिससे मुझे कोई बीमारी हो, बीमारी तो चोरों को होनी चाहिए, डाकुओं को या फिर उन लोगो को जो रात में फूल तोड़ते हैं, मैं इस बीमारी का योग्य पात्र नहीं था। पर फिर भी इस बीमारी ने मुझे जकड़ा था, इसलिए मैं नाराज था, सबसे, और सबसे ज्यादा उस बंसी वाले से, की उसने मुझे ये बीमारी क्यूं दी।
मां कहती थी की सुबह उठने के बाद, बंसी वाले के सामने झुक के प्रणाम करना चाहिये, पर तीन दिन से मैं अपनी नाराज़गी जाहिर करने के लिए उन्हें अनदेखा कर रहा था। मैं न ही उन्हें देखता और न ही उस गेंदे के फूल को। मुझे लग रहा था मेरे और मां के साथ विश्वासघात हुआ है, छल हुआ है, मैने नियति को मानने से मना कर दिया था।
मुझे भावना दिन में दो बार मिलती थी, एक तो जब मै शाम को टहलने के लिए पास के खाली खेत में जाता हूं और दूसरा, रात में जब भावना आकार मेरे बिस्तर के पास वाली कुर्सी पर बैठ ती है।
ये सिलसिला तब से चलता आ रहा है, जब से भावना ने अपना देह त्यागा था।
वो उस दिन शाम को मेरे साथ उस खाली खेत में आई थी, जहां सिंहपर्णी के फूल लगे थे। उसने मुझे बोला था की
"तुम अगर अपनी सारी समस्या इस फूल से बोलकर इसे फूक मारकर उड़ा दोगे तो सारी समस्या हल हो जाएंगी" और मैं इस बात पर हस दिया था। जब अगले दिन मुझे खबर आई की भावना अत्यंत ज्वर के कारण नहीं रही तब मैं उस खेत में गया और देर तक उसे ढूंढता रहा, मुझे लगा वो वहां छुप रही है, पर यूं था नहीं, मैने आज तक कभी मेरी समस्या उस फूल से कहकर, फूक मारकर उड़ाया नहीं था, मैं शायद इस बात को बचकानी मानता था।
तीन दिन हो गए, भावना आई नहीं, न ही खेत में, न ही रात में बिस्तर के पास, मैं विचलित था क्योंकि वो मुझसे नाराज़ थी। किसलिए नाराज थी? इसलिए की मैने अपनी समस्याएं सिंहपर्ण के फूल के साथ नही उड़ाई थी?
पर भावना आज रात आई ,कुर्सी पर बैठी भी, पर कुछ बोली नहीं, उसकी छाया पहले से और भी फीकी थी और उसे शायद मैं दिख ही नही रहा था, मैं उसके पास गया, उसका माथा चूमा, उसे मनाया की एक बार देख तो लो मेरी तरफ, पर वो कुछ नही बोली, बस मूक बैठी रही।
अंत में जब मै अपनी बड़बड़ में, बंसी वाले को मेरी बीमारी के लिए दोष देने लगा तब वो उठी, और अपनी उंगली मेरे होठ पर लगा दी। "श्श! उनके बारे मत कहो कुछ"
"क्यों न कहूं, उनकी वजह से..."
"उनकी वजह से सब कुछ हुआ है, जानती हूं, पर जब तक तुम नियति को स्वीकार नहीं कर लोगे तब तक तुम्हारी मदद कौन करेगा? तुम बीमार हो, इस बात को मानो और आगे बढ़ो, विश्वास करो की एक दिन फूल गिरेगा। मैं तुम्हारे अलावा किसको नही दिखती, क्यों? क्योंकि कोई विश्वास नहीं करता, अकेले तुम भरोसा करते हो, सो मैं तुमसे मिलने आ जाती हूं, तुम किसी दिन मान लोगे की भावना मात्र मेरी कल्पना है, उस दिन से भावना मात्र कल्पना ही रह जाएगी" वो बोल कर फिर ओझल हो गई।
मैं भावना को खोना नही चाहता था, और न ही मेरे जीवन को और न ही मेरे विश्वास को, विधाता की विधि को स्वीकारना ही बुद्धिमता है। विधाता ही चाहते थे की भावना को अपने पास बुलाएं सो उन्होंने बुलाया, विधाता ही चाहते थे की भावना दिन में दो बार मुझसे मिला, सो ऐसा हुआ। विधाता का अपना तरीका है संतुलन बनाने का।
मैं अगले दिन फिर खेत में गया और लेट गया, इस बार मन में न ही कोई खेद था और न ही वेदना। स्वीकृति में सादापन होता है, पानी जैसा सादापन, उसका अपना स्वाद नहीं होता, पर उसका होना आवश्यक होता है। बस अंतर इतना है की पानी की प्यास होती है, स्वीकृति की नहीं होती। स्वीकृति सहज ही आती है। स्वीकृति में भरोसा होता है। स्वीकृति में शांति होती है।
मैंने एक सिंहपर्णी का फूल हाथ में लिया, मैं यकीन नहीं कर पा रहा था की मैं ऐसी बचकानी हरकत करने जा रहा हूं। मैंने बहुत सोचने का प्रयास किया पर पाया कि मेरे पास कोई समस्या नही है, मेरे पास एक पल है जो मैं ही रहा हूं, इस पल के मैं जीवित हूं, अगले पल का पता नही, इस पल की स्वीकृति है, इस पल में कोई समस्या नही है, इस पल में न प्यास है न भूख, बस मुट्ठी भर आशा है और बाहों घर विश्वास।
मैंने उस फूल को फूक मारा और भावना उस ही पल मुझे दिखी, इस बार फीकी फीकी नही, पूरी की पूरी अच्छे से, जैसे पहले दिखती थी, उसने करीब आ कर मेरा माथा चूमा और मैं खुश था की मैं इस पल को जी सकता हूं।
घर गया तो मां वैसे ही एक जगह आलती पालती मार कर बंसी वाले के सामने बैठी थी, उनकी प्रार्थना हर बार एक समान होती थी। वो इंतजार करने में माहिर थी।
इस बार मैं भी बैठा, बिना किसी आकांक्षाओं के, बिना किसी वेदना, बिना किसी कष्ट के। और एक टक मां के जैसे मूर्ति को देखता रहा।
मूर्ति आज पहले से ज्यादा मुस्कुरा रही थी, मैं उस मुस्कुराहट को अपने शरीर में उतार रहा था, मूर्ति मुझसे बात कर रही थी।
"स्वीकृति का स्वाद सादा होता है" यह वाक्य मेरे कानो में गूंजायमान हो रहा था,
"स्वीकृति का स्वाद सादा होता है" बार बार यह वाक्य गूंज रहा था, गति तेज हो रही थी, मेरी सारी सुध खो गई थी।
मुझे बस मुस्कुराता हुआ बंसी वाला दिख रहा था, और सुनाई दे रहा था,
"स्वीकृति का स्वाद सादा होता है"।
कितना समय बीत गया मुझे अंदाजा नहीं था, मैं जब होश में आया तब मां मुझे झकझोर कर हिला रही थी,मेरी आंखें खुली और मैने देखा, मूर्ति के नीचे जमीन पर गेंदे का फूल गिरा था।